कहते
है,
मन के
घाव
वक्त
भर देता है।
क्या
वो वक्त मुझे नसीब होगा?
मेरे
लिए वक्त हमेशा
किरनों की रोशनी
की तरह है,
जो सिर्फ
नजर आता है।
महसूस
होता है।
उम्मीद
का सवेरा लाता है।
बस्स
और कुछ नही,
मेरी कहानी
वही की वही थमी है...
शायद
इसी वजह से
कोशिश
यही रहती,
वक्त
आने से पहले वक्त के बारें में सोचू
उसके
आनेसे पहले अपनी पहल करू
लोग
कहते चंचल, मूडी
उन्हे
क्या पता
दिवारों
से बाते करना
सब
कुछ पास होकर भी
अपनेपन
के एहसास को तरसना
ये ‘प्यार’ शब्द जैसे मेरे लिए है ही नही
....
मेरे वक्त घडी में
वो
रेत ही नही है।
खुद
जो रेत बन गयी हूँ...
जिसपर
धूप छाँव का कोई असर नही होता...
काश
इस रेगिस्तान में
पानी
ना सही
मन के
व्दार तो खुले...

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