मेरे सपनें, मेरे वादें
इनमे फर्क सिर्फ इतना
जैसे आपकी सोच मेरे लिए...
सपनों के आशियाने से
ख्वाब देखने की ताकद मिली
और मैं निखर के आई तो;
आपको मुझपर हसतें हुए देखा
आपका हँसना जायज है…
आपको यकीन दिलाना,
आप क्या सोचते है?
इसे बदलने की हिम्मत मुझमें
कहाँ?
मुझे तो बस खुद पर विश्वास है…
वो खोना नही चाहती,
किसी के भी बातों में आकर,
चाहें जो भी हो…
एक अलग सोच के साथ
चल पड़ी हूँ मैं
रुकावटें तो आती रहेगी
और आनी भी चाहिए...
उनसे हार जाना,
डर के रुक जाना
मुझे मंजूर नही
इस सफर में
खुद को संभालते हुए
हर दिन की शुरुवात नए सिरे
से करना
अब यही मेरी जिंदगी है
जिसपर मुझे ‘नाज’ है...
