मेरे गाँव में मेरा बहोत
बडा घर हैं...
जो मुझे बहोत प्यारा लगता
हैं।
वो मेरे हर खुशी का पिटारा
हैं।
आज इतने सालों बाद
यहा आईं, तो क्या देखा?
घर के आंगन मे पाँव रखते
ही,
कुछ अजीब सा खालीपन लगने
लगा।
कभी इसी आंगन में बचपन के,
मासूम लडाईं-झगडें सुनाई
देते थे।
जो घर बचपन मे बडा लगता था,
सपनों का आशियाना लगता था।
आज वो घर एका एक छोटा और
खाली खाली
कैसे लगने लगा?
लगता है, घर छोटा नही मैं
बडी हो गयी।
दिल टूँटा...
घर के आंगन मे बचपन
छूँटा...
अब उस छोटेसे घर में,
मेरे बचपन की याँदे तो थी।
मगर मैं उसमे थी ही नही...
आज मेरे पास उस घर में,
बिताए हुए चंद लम्हों के
सिवा कुछ भी नही...
ए वक्त, जरा थमकर पिछे चल!
मैं ‘वो लम्हें’ फिर से जिना चाहती हूँ...


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